दोराहें


दोराहे पर हूँ खड़ा
इस सोच में हूँ पड़ा
राह कौन सी जाऊँ मै ।
किस ओर पाँव बढाऊँ मै
एक तरफ हैं कंकड़ काँटें,
एक तरफ फुलवारी है !!
एक तरफ है ग़म के बादल,
एक तरफ खुशहाली है !!
अब खुदको क्या समझाऊँ मै,
राह कौन सी जाऊँ मै ।।
एक तरफ है उगता सूरज,
एक तरफ परछाई है !!
एक तरफ है झूटी दुनिया,
एक तरफ सच्चाई है !!
कहीं खो न जाऊँ इस जाल में कैसे मंजिल पाऊँ मै,
किस ओर कदम उठाऊं मै
राह कौन सी जाऊं मै ।।।